मैं मंदिर जाता हूँ हर रोज़, अब कोई मुझे शराबी नहीं कहता कलयुग हे, चलता हे; यहाँ कोई देर तक पापी नहीं रहता यूँ तो मैं सुनाता हूँ कहानी हिरण्यकश्यप की सबको पर मस्जिद के खंभो मे मुझे कभी ईश्वर नहीं दिखता मंदिर के घंटी और भजन सुरीले करता हूँ हर रोज़ तो क्या हुआ [...]
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मंदिर
Posted in कविता, साहित्य, हिन्दी, Hindi Poems, Life, tagged ईश्वर, मंदिर, Hindi, Ishwer, khuda, Literature, Maheep, Maheep Saraf, Poem on अक्टूबर 6, 2009 | 1 Comment »