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Archive for अक्टूबर, 2009

मैं मंदिर जाता हूँ हर रोज़, अब कोई मुझे शराबी नहीं कहता कलयुग हे, चलता हे; यहाँ कोई देर तक पापी नहीं रहता यूँ तो मैं सुनाता हूँ कहानी हिरण्यकश्यप की सबको पर मस्जिद के खंभो मे मुझे कभी ईश्वर नहीं दिखता मंदिर के घंटी और भजन सुरीले करता हूँ हर रोज़ तो क्या हुआ [...]

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चाँद को देखता था हर रोज़ आसमान में, कभी ये मेरे भी करीब होगा आज मुट्ठी में हे चांदनी मगर, हथेली की तक़दीर भी दिखती नहीं ———- इस कदर तेरे साथ को तरसते रहे हर दम तब तक तेरे साथ की लेकिन ये हालत होगी हमको खबर ना थी ———- कहते हैं लोग, खुदा नहीं [...]

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लोग मिलतें हैं महफिलों में, हज़ार चेहरों को बदल कर काम के वक़्त किसी भी अपने का चेहरा नहीं मिलता ———- कुछ लोग मेरे घर आये थे, गली में मंदिर बन रहा हे हर शाम मयखाने में अब भीड़ बढ़ने लगी हे ———- कुछ इस तरह का बदलाव इंसान में आया हे हर जगह उसमे [...]

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