बस एक बार बता दे ग़लती मेरी, चाहे फिर कभी बात ना हो
मुस्करा दे एक बार अब तो, इस तरह मुझसे नाराज़ ना हो
तड़पता हे पंछी कोई जब, पँखो में उसके परवाज़ ना हो
हालत हे मेरी भी वो ही, तू अब तो यूँ नाआवाज़ ना हो
नज़र नहीं आता कोई तेरे बिन, जैसे कोई बस्ती आबाद ना हो
थम जाती हे दुनिया की आवाज़ें, इस तरह से तू उदास ना हो
बुला रही हे लहरें समंदर की, पर होठों में जैसे कोई प्यास ना हो
रोक न अब मेरी साँसों को, इस तरह मुझसे नाराज़ ना हो
aap ki likhi hui shayriyon me mujhe sab se achchi yahi shayri lagti hai.