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कुछ और ख्याल…

ना बहा इस आँखो से अश्कों को बार बार
ज़माने  को इनकी कहीं आदत ना हो जाए
बूँद रेगिस्तान में लगती हे रहमत की तरह
समंदर मे बूँद कभी बूँद भी ना रह पाए
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तेरे चेहरे पर ये गुस्सा ग़ज़ब हे, बहुत सताता हे
याद तो इसकी भी आती हे, तेरे जाने के बाद
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उस रात को नींद खुली थी अचानक मेरी, उसकी बंद आँख मे नमी थी
मेरी कोई बात अच्छी ना लगी हो शायद, या मेरे प्यार मे कोई कमी थी

मैं तो मसखरा था, कुछ कह दिया होगा शायद उसे हँसाने को
पर वो रात शायद बेवफा थी, मेरी कोई भी बात जस्बात ना बनी थी

शायरियां

तेरे चेहरे पर ये गुस्सा ग़ज़ब हे, बहुत सताता हे
याद तो इसकी भी आती हे, तेरे जाने के बाद
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ये वादा किया था उनसे मैं आऊंगा मिलने हर हाल में वापस
थोडा वक़्त और लगेगा एक बार मौत को धोखा देने में शायद
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सपने हकीकत में बदलते क्यों नहीं, वो साथ हे पर कहते कुछ क्यों नहीं
अश्क होते हैं हर बार आँखों में, चेहरे पर कभी दिखती मुस्कराहट क्यों नहीं
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तेरा शरमाना, कयामत हे, होश उड़ा देता हे कुछ समझने से पहले
खुदा के वास्ते नज़रें उठा ले दीवाने को अपने कुछ कहने से पहले
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तुमने कहा हे बस इतना काफी हे जीने के लिए, अब कुछ और नहीं दरकार हे
ये रौनक जो मेरे चेहरे पर हे एक अरसे से  , कुछ और नहीं तेरा प्यार हे
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यूँ तो और भी हे ज़माने में आशिक मेरे पर तेरी बात ही कुछ और है
महफिलें देखी हैं और भी  आलिशान बहुत, तेरे साथ की बात ही कुछ और है

ख्वाब

आज कुछ होश नहीं
बस तेरी यादें हैं साथ में

 तेरी आँखें तेरी बातें
तेरी खुश्बू मेरी हर बात में

 हर ख्वाब मे है तू,
तेरी मुस्कुराहट यूँ चंचल सी

और रोज़ नया एक ख्वाब हे
हर नयी उस रात में

जाने क्यों

आज तेरी याद आ रही हे
हर पहर हर पल, जाने क्यों

तेरे सामने आया था कई बार
पर कुछ कहा नहीं जाने क्यों

चेहरे कई दिखते हैं सरे बाज़ार
अकेला निकलता हूँ जब मैं

पर तेरे चेहरे की यादें
मिटती नहीं हैं अब भी, जाने क्यों

मंदिर

मैं मंदिर जाता हूँ हर रोज़, अब कोई मुझे शराबी नहीं कहता
कलयुग हे, चलता हे; यहाँ कोई देर तक पापी नहीं रहता

यूँ तो मैं सुनाता हूँ कहानी हिरण्यकश्यप की सबको
पर मस्जिद के खंभो मे मुझे कभी ईश्वर नहीं दिखता

मंदिर के घंटी और भजन सुरीले करता हूँ हर रोज़
तो क्या हुआ अगर मे बूढ़ी माँ की सेवा नहीं करता

यूँ तो मेने भी एक बार भगवान को देखा हे
पर कभी वो ही चेहरा मंदिरों में नहीं दिखता

कुछ और शायरी

चाँद को देखता था हर रोज़ आसमान में, कभी ये मेरे भी करीब होगा
आज मुट्ठी में हे चांदनी मगर, हथेली की तक़दीर भी दिखती नहीं
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इस कदर तेरे साथ को तरसते रहे हर दम तब तक
तेरे साथ की लेकिन ये हालत होगी हमको खबर ना थी
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कहते हैं लोग, खुदा नहीं दिखता हे इस बेदर्द ज़माने में
तो वो कौन हे जो तेरी सूरत में दिखता हे तेरे मुस्कुराने पे
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सिर्फ़ एक आवाज़ की दूरी थी  दरमियाँ और कुछ नहीं
तूने  कुछ कहा भी नहीं मेरी बात को सुना भी नहीं
एक अरसे से नाराज़ हे तू मुझसे उस दौर के बाद
सिर्फ़ चाहा हे तुझे कुछ और भी तो मेरी खता नहीं
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शायरी/मुक्तक

लोग मिलतें हैं महफिलों में, हज़ार चेहरों को बदल कर
काम के वक़्त किसी भी अपने का चेहरा नहीं मिलता
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कुछ लोग मेरे घर आये थे, गली में मंदिर बन रहा हे
हर शाम मयखाने में अब भीड़ बढ़ने लगी हे
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कुछ इस तरह का बदलाव इंसान में आया हे
हर जगह उसमे शैतान उभर आया हे
घरों से मार कर निकल दिया गरीबों को
उसी जगह पर आलिशान मंदिर बनाया हे
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गज़ब सी दोस्ती हे तेरी यादों की मेरी सांसों के साथ
साथ में आती दोनों, कभी एक साथ रुक जायेगी.
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धुंधलाई सी हे नज़र मेरी, कुछ खबर नहीं इन राहों की.
कोई बरगद नहीं मिला और, बड़ी प्यास लगी हे छाँव की
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तनहाइयों के आकाश मैं कब से पंख फैलाए उड़ रहा हूँ.
पर दूर दूर तक जमीं दिखती नहीं ग़मों के बादलों के बीच.
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मैं बहुत उदास हूँ आजकल, मेरा मित्र मुझे सत्कार नहीं देता
कई मौके आये मेरी जिंदगी में, वो मुझे कोई उपहार नहीं देता
हाँ वो मेरे साथ हर बार अकेला होता हे उस दिन सड़क पर
जब घने अँधेरे में मेरा साया भी मेरा साथ नहीं देता
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अश्क बह जाते हैं आँखों से, तेरे दिल में उतर जाने को
तू कमबख्त देखता ही नहीं, दर्द-ऐ-दिल के इस नज़ारे को
तेरी खातिर दुनिया से लड़ जाता हे ये दिल
और तू मशगूल हे, तमाशे पे तालियाँ बजाने को.
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इस तरह से से मुझे नज़रंदाज़ न कर, तेरे दीवानों में कोई मुझसा न होगा.
यूँ तो तारे हैं आसमान में हजारों, आफ़ताब-ऐ-सहर(Morning sun) सा कोई दूसरा ना होगा
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एक किस्सा हूँ या हयात-ऐ-दिल(World of Heart) तेरा, इस बात का कोई मुझे ग़म नहीं
गाली भी निकले मेरे नाम के साथ, तो अता-ऐ-खुदा(Gift of GOD) से कम नहीं

रिश्ते

रिश्ते बहुत हैं इस संसार में, हर किसी को थोड़ा वक़्त चाहिए,
मैं भी दुखी होता हूँ कभी कभी, मुझे भी किसी का प्यार चाहिए

यूँ तो उन्होने मुझे थामा हे, दरिया के किनारे पर कई बार
तूफ़ानी मझधार जब हो राह में, ऐसे मे भी किसी का साथ चाहिए.

मैने कहा था एक बार कभी उनसे, मैं थोड़ा बीमार हूँ आजकल
मेरी नींद पर भी आज उनको, चाहे थोड़ा सा, पर अधिकार चाहिए

वर्तमान

जो सदाएँ सुनाई देती थी सागर की लहरों में
वो गुम हो गई हे कहीं बमो की खबरों मे
ढूंढ रहा हूँ वो बचपन, हर गली हर मोहल्ला
जो खेलता था कभी इन खेतों की फसलों में.

 जिंदगी जो बसती थी इन घरों के आँगन में 
रोती हे वो भी डर कर इन दंगों के  क्रंदन में
ये आँसू, ये तन्हाई, इन चेहरों पे ऐसे
साँप लिपटा हो कोई जंगलों के चंदन से

कौन सी हक़ीकत है इन आँसुओं के पीछे
क्या देखा है आँखो ने उन सपनो के नीचे
गुमसुम सा खड़ा हे दुबक के कोने मे
 ये मासूम सा बचपन,  क्यों बाहों को भीचे

परियों की दुनिया सी बस्ती जो उजड़ी हे
सपनो की, अरमानों की, हस्ती जो बिगड़ी हे
ले जाएगी ये बचपन ना जाने कितनों के छीन के
धर्म और भगवान की ये जंग जो छिड़ी हे

हँसी

हिरण हो वन में या तरंग पवन में
दीपक हो जैसे तमस सघन में
मीठी भोली हँसी तुम्हारी
छाव मिली हो भारी तपन में

वीणा की राग या भंवरे की गुंजन
शाम की वेला मे इश् का वंदन
हँसना मुस्कराना खिलखिलाना तेरा
पावन जैसे दमकता कुन्दन

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